कहते हैं शादी के बाद सबसे बड़ी परीक्षा ससुराल में रहना होता है। मैं रोहित, और मेरी शादी को अभी दो साल हुए थे जब ये कहानी घटी। पत्नी ने कहा, “चल, एक हफ्ते के लिए मायके चलते हैं। माँ बीमार है।” मैंने हाँ कह दी। सोचा, कोई बात नहीं। पर जब हम पहुँचे तो पता चला कि सासू माँ को सिर्फ हल्का सा बुखार था, पर उन्होंने पूरे एक हफ्ते का प्रोग्राम बना रखा था। “बेटा, ये दीवार पेंट करवानी है। बेटा, मार्केट से सामान लाना है। बेटा, रिश्तेदारों के यहाँ जाना है।”
मैं टायर हो रहा था। दिन में दौड़, रात में सब सो जाते। पर मुझे नींद नहीं आती थी। क्योंकि मैं शहर का आदी हूँ, वहाँ के माहौल का। ससुराल में सब सुबह पाँच बजे उठ जाते थे, और मुझे तो सुबह के दस बजे नींद आती है। तालमेल बैठाना मुश्किल था।
तीसरे दिन रात को मैंने सोचा, क्यों न थोड़ा मोबाइल देखूँ। फोन चार्ज था। वाई-फाई भी था। मैंने स्क्रॉल करना शुरू किया। तभी याद आया, ऑफिस के एक दोस्त ने पिछले महीने बताया था कि वो कभी-कभी कैसीनो गेम्स खेलता है। मैंने उसे तुरंत मैसेज किया। उसने जवाब दिया, “अरे, अभी खेल रहा हूँ। लिंक चाहिए? official Vavada mirror पर जाओ, पक्का चल रहा है।”
मैंने लिंक खोला। पंजीकरण में दो मिनट लगे। मैंने पहली बार सिर्फ 250 रुपये डाले। सोचा, आधी रात को और क्या करूँ? मैंने एक कार्ड गेम चुना, जिसका नाम था “अंडर ओवर”। पहले दो दांव हार गया। बस 150 रुपये बचे थे। मैंने मन ही मन कहा, “चलो, तीन और दांव लगाता हूँ।”
और फिर शुरू हुआ वो सिलसिला। 50 रुपये का दांव लगाया, जीत गया। 100 रुपये का दांव लगाया, जीत गया। 200 रुपये का लगाया, जीत गया। मैंने सोचा, ये क्या हो रहा है? लगातार छह जीतें। मेरे 250 रुपये अब 2,100 हो चुके थे। पसीना आ गया था। मैंने तुरंत 2,000 रुपये निकाल लिए। 100 रुपये से फिर से खेलना शुरू किया, और जल्दी ही वो भी हार गया। पर मैं पहले ही बच चुका था।
उस रात मैं सो नहीं पाया, पर इस बार नींद की कमी से नहीं, उत्साह से। अगली सुबह सासू माँ ने कहा, “बहुत खुश दिख रहे हो आज। क्या हुआ?” मैंने कहा, “बस अच्छा सपना देखा, माँ।”
लेकिन सपना असली था। और उस रात के बाद मेरी मुसीबत शुरू हो गई। क्योंकि मैंने सोचा था कि मुझे गेम समझ आ गया है। अगले दिन रात को फिर से लॉगिन किया। इस बार 500 रुपये डाले। और एक नया गेम खोला। थ्रीडी स्लॉट था, बहुत खूबसूरत। पर पैसे उड़ने लगे। 500 से 200, फिर 200 से 50। मैंने गुस्से में 1,000 और डाल दिए। वो भी गए। कुल नुकसान 1,500 रुपये। पिछली रात का पूरा प्रॉफिट चला गया, और अपने 250 भी।
मैं बुरी तरह परेशान था। सुबह नाश्ते में चुप रहा। सासू माँ ने पूछा, “बेटा, बीमार हो?” मैंने कहा, “बस सिर में दर्द है।”
शाम को मैंने अपनी पत्नी से कहा, “तुम्हारी माँ के यहाँ बोरियत होती है। कुछ तो करूँ।” उसने हँसते हुए कहा, “तू तो शहर का राजकुमार है। यहाँ धीरे-धीरे अभ्यास हो जाएगा।” उसने मेरा हाथ पकड़ा और कहा, “चल, मैं तुझे घुमाने ले चलती हूँ।” हम बाइक पर ससुराल के गाँव में घूमने निकले। ठंडी हवा, सन्नाटा, और दूर तक खेत। उस शाम मुझे कुछ शांति मिली।
रात को वापस आकर मैंने फैसला किया कि अब पुरानी गलती नहीं दोहराऊंगा। मैंने फिर से official Vavada mirror खोला। इस बार एक पेपर पर नियम लिखे। “1. हर दिन सिर्फ 300 रुपये डालूँगा। 2. अगर 500 रुपये का लाभ हुआ तो तुरंत रोकूँगा। 3. अगर 200 रुपये का नुकसान हुआ तो भी रोकूँगा।”
पहली रात मैंने 300 डाले, 200 का फायदा किया और रुक गया। दूसरी रात 300 डाले, 50 का नुकसान हुआ, रुक गया। तीसरी रात सोमवार थी। 300 डाले। एक साधारण से खेल में बैठा। एक घंटा बीत गया। हार-जीत बराबर थी। अचानक एक बोनस आया। 10 फ्री स्पिन। मैं घबरा गया। पहले स्पिन में 50, दूसरे में 70, तीसरे में 150। इसी तरह चलता रहा। आखिरी स्पिन में 900 रुपये आए। कुल 1,450 रुपये का फायदा हुआ। मैंने नियम याद किया—तुरंत रोकूँगा। और मैंने रोक दिया।
उस रात मैंने 1,450 रुपये निकाले। पिछले सारे नुकसान वसूल हो गए। मेरे खाते में अब कुल 1,200 रुपये का शुद्ध लाभ था। ससुराल छोड़ने से पहले मैंने सासू माँ के लिए एक अच्छा सा शॉल खरीदा, और ससुर जी के लिए एक स्मार्टवॉच। जब उन्होंने पूछा कि इतना सब कहाँ से आया, मैंने कहा, “ऑफिस का बोनस था, माँ।”
वो खुश हो गईं। मेरी पत्नी ने मुझे घूरते हुए कहा, “सच बोल रहा है न तू?” मैंने कहा, “हाँ, असली बोनस था। एक छोटी सी जीत का बोनस।”
मैंने उसे पूरी कहानी बता दी। पहले वो डरी, फिर समझाई, फिर बोली, “तेरे नियम अच्छे हैं। बस उनका पालन करता रह।” मैंने वादा किया।
आज उस घटना को दो साल हो गए हैं। मैं अब भी कभी-कभी खेलता हूँ, पर कभी भी
मैं टायर हो रहा था। दिन में दौड़, रात में सब सो जाते। पर मुझे नींद नहीं आती थी। क्योंकि मैं शहर का आदी हूँ, वहाँ के माहौल का। ससुराल में सब सुबह पाँच बजे उठ जाते थे, और मुझे तो सुबह के दस बजे नींद आती है। तालमेल बैठाना मुश्किल था।
तीसरे दिन रात को मैंने सोचा, क्यों न थोड़ा मोबाइल देखूँ। फोन चार्ज था। वाई-फाई भी था। मैंने स्क्रॉल करना शुरू किया। तभी याद आया, ऑफिस के एक दोस्त ने पिछले महीने बताया था कि वो कभी-कभी कैसीनो गेम्स खेलता है। मैंने उसे तुरंत मैसेज किया। उसने जवाब दिया, “अरे, अभी खेल रहा हूँ। लिंक चाहिए? official Vavada mirror पर जाओ, पक्का चल रहा है।”
मैंने लिंक खोला। पंजीकरण में दो मिनट लगे। मैंने पहली बार सिर्फ 250 रुपये डाले। सोचा, आधी रात को और क्या करूँ? मैंने एक कार्ड गेम चुना, जिसका नाम था “अंडर ओवर”। पहले दो दांव हार गया। बस 150 रुपये बचे थे। मैंने मन ही मन कहा, “चलो, तीन और दांव लगाता हूँ।”
और फिर शुरू हुआ वो सिलसिला। 50 रुपये का दांव लगाया, जीत गया। 100 रुपये का दांव लगाया, जीत गया। 200 रुपये का लगाया, जीत गया। मैंने सोचा, ये क्या हो रहा है? लगातार छह जीतें। मेरे 250 रुपये अब 2,100 हो चुके थे। पसीना आ गया था। मैंने तुरंत 2,000 रुपये निकाल लिए। 100 रुपये से फिर से खेलना शुरू किया, और जल्दी ही वो भी हार गया। पर मैं पहले ही बच चुका था।
उस रात मैं सो नहीं पाया, पर इस बार नींद की कमी से नहीं, उत्साह से। अगली सुबह सासू माँ ने कहा, “बहुत खुश दिख रहे हो आज। क्या हुआ?” मैंने कहा, “बस अच्छा सपना देखा, माँ।”
लेकिन सपना असली था। और उस रात के बाद मेरी मुसीबत शुरू हो गई। क्योंकि मैंने सोचा था कि मुझे गेम समझ आ गया है। अगले दिन रात को फिर से लॉगिन किया। इस बार 500 रुपये डाले। और एक नया गेम खोला। थ्रीडी स्लॉट था, बहुत खूबसूरत। पर पैसे उड़ने लगे। 500 से 200, फिर 200 से 50। मैंने गुस्से में 1,000 और डाल दिए। वो भी गए। कुल नुकसान 1,500 रुपये। पिछली रात का पूरा प्रॉफिट चला गया, और अपने 250 भी।
मैं बुरी तरह परेशान था। सुबह नाश्ते में चुप रहा। सासू माँ ने पूछा, “बेटा, बीमार हो?” मैंने कहा, “बस सिर में दर्द है।”
शाम को मैंने अपनी पत्नी से कहा, “तुम्हारी माँ के यहाँ बोरियत होती है। कुछ तो करूँ।” उसने हँसते हुए कहा, “तू तो शहर का राजकुमार है। यहाँ धीरे-धीरे अभ्यास हो जाएगा।” उसने मेरा हाथ पकड़ा और कहा, “चल, मैं तुझे घुमाने ले चलती हूँ।” हम बाइक पर ससुराल के गाँव में घूमने निकले। ठंडी हवा, सन्नाटा, और दूर तक खेत। उस शाम मुझे कुछ शांति मिली।
रात को वापस आकर मैंने फैसला किया कि अब पुरानी गलती नहीं दोहराऊंगा। मैंने फिर से official Vavada mirror खोला। इस बार एक पेपर पर नियम लिखे। “1. हर दिन सिर्फ 300 रुपये डालूँगा। 2. अगर 500 रुपये का लाभ हुआ तो तुरंत रोकूँगा। 3. अगर 200 रुपये का नुकसान हुआ तो भी रोकूँगा।”
पहली रात मैंने 300 डाले, 200 का फायदा किया और रुक गया। दूसरी रात 300 डाले, 50 का नुकसान हुआ, रुक गया। तीसरी रात सोमवार थी। 300 डाले। एक साधारण से खेल में बैठा। एक घंटा बीत गया। हार-जीत बराबर थी। अचानक एक बोनस आया। 10 फ्री स्पिन। मैं घबरा गया। पहले स्पिन में 50, दूसरे में 70, तीसरे में 150। इसी तरह चलता रहा। आखिरी स्पिन में 900 रुपये आए। कुल 1,450 रुपये का फायदा हुआ। मैंने नियम याद किया—तुरंत रोकूँगा। और मैंने रोक दिया।
उस रात मैंने 1,450 रुपये निकाले। पिछले सारे नुकसान वसूल हो गए। मेरे खाते में अब कुल 1,200 रुपये का शुद्ध लाभ था। ससुराल छोड़ने से पहले मैंने सासू माँ के लिए एक अच्छा सा शॉल खरीदा, और ससुर जी के लिए एक स्मार्टवॉच। जब उन्होंने पूछा कि इतना सब कहाँ से आया, मैंने कहा, “ऑफिस का बोनस था, माँ।”
वो खुश हो गईं। मेरी पत्नी ने मुझे घूरते हुए कहा, “सच बोल रहा है न तू?” मैंने कहा, “हाँ, असली बोनस था। एक छोटी सी जीत का बोनस।”
मैंने उसे पूरी कहानी बता दी। पहले वो डरी, फिर समझाई, फिर बोली, “तेरे नियम अच्छे हैं। बस उनका पालन करता रह।” मैंने वादा किया।
आज उस घटना को दो साल हो गए हैं। मैं अब भी कभी-कभी खेलता हूँ, पर कभी भी
0